Sunday, February 15, 2026

प्रीतम आन मिलो / डॉ लाल थदानी


*प्रीतम आन मिलो*

फरवरी की धूप में भीगी कोई साँस,
मन की देहरी पर उतर आया उजास।
चुप हवा ने छू लिया स्मृति का वन,
पलकों पर फैल गया लाल आकाश।

अनकहे शब्दों का धीमा कंपन,
भीतर जाग उठा अद्भुत अहसास
एक स्पर्श से खुलता बंद मौसम,
रगों में बहने लगता मधुमास।

झंकृत हँसी में झरता भव्य उजाला,
रातों को मिल जाता मधुर प्रकाश।
साथ चले तो राह भी सरगम गाए,
पत्थर में खिल उठे फूल हरित घास।

रिश्ते लिखे नहीं जाते कागज़ पर,
धड़कनों में बसती उनकी प्यास।
चुप्पी भी बोल उठे पास आकर,
साँसों में घुल जाए सुवास।

प्रेम नहीं मांगता शपथ या वादा,
बस चाहता मीठी यादों का वास।
एक नाम धड़कता भीतर गहरे,
जैसे मंदिर में दिए जलाता दास

ये जीवन प्रिये ढाई आखर का सार,
मिलन की चाह दे आत्मिक आभास।
प्रेम ही आरंभ है और प्रेम ही अंतिम,
बाक़ी सब जग का क्षणिक प्रवास।

*डॉ लाल थदानी*
#अल्फ़ाज़_दिलसे
14.02.2022

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