मेरा अंतर्मन / डॉ लाल थदानी
मेरा मन हमेशा मुझे कुछ कहता रहता है,
अगले ही पल उसे समझाना पड़ता है।
सबकी खुशी के लिए मुस्कुराना पड़ता है,
अपने आँसू छिपाकर भी निभाना पड़ता है।
जीवन दुष्कर है, इतना आसान भी नहीं,
हर मोड़ पर स्वयं को आज़माना पड़ता है।
अपने हों या गैर, सफ़र रुकता नहीं कभी,
बिन थके कदमों को आगे बढ़ाना पड़ता है।
घड़ी की सुइयों सा जीवन तेज़ भागता है,
वक्त के साथ ख़ुद को दौड़ाना पड़ता है।
ख़ुद के लिए नहीं मालूम हम कब जिए
कुछ साबित करने के लिए खप्पना पड़ता है
कुछ सपनों को दिल में दफनाना पड़ता है।
पागल अंतर्मन को ज़मीन पर लाना पड़ता है।
जीने के लिए हर पल थोड़ा मरना पड़ता है,
अपनों के लिए हर दर्द उठाना पड़ता है।
मैं श्रेष्ठ हूँ — इस भ्रम से निकलना पड़ता है
"मैं" से बिछड़कर "हम" बनना पड़ता है।
डॉ. लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे 🌹
22 जून 2026
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