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Tuesday, February 10, 2026

#अल्फ़ाज़_दिलसे / डॉ लाल थदानी

            1.  *कसक*
रिश्तों में कहीं न कहीं रह जाती है कसक,
जो ज़ुबाँ कह न सके, बन जाती है कसक।
मुस्कुराते हुए भी अक्सर आँखें बता देती हैं,
हँसी के पीछे छुपी हुई यादों की है कसक।

किसी की बेपरवाही, किसी से बेइंतहा प्यार,
दोनों ही सूरतों में दिल को सताती है कसक।
टूटकर भी जो संभले, वही समझ पाया,
गिरने के बाद भी भीतर रह जाती है कसक।

कभी अपनों की दूरी, कभी ख़ुद से शिकवा, कोई न कोई टीस मन को जगाती है कसक।
वक़्त मरह़म भी है और वक़्त ज़ख़्म भी,
भरते घावों के साथ रह जाती है कसक।

हमने शिद्दत से निभाया, वो निभा न पाए,
अधूरी चाहतों से जन्म लेती है कसक।
अल्फ़ाज़ थक जाते हैं जब दर्द कहने में,
तब ख़ामोश निगाहें कह जाती है कसक।

लाल इतना ही सीखा है ज़िंदगी से अब तक,
जीना सिखा देती है दिल में दबी हुई कसक।

डॉ लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे
14.11.2025


           2.    *नया साल*
नया साल आया है, लाए उजियार,
प्यार की राहें हों, दिल में गुलज़ार ।
छोड़ो कल की बातें8 कड़वी यादें,
नया साल लाया है खुशियाँ अपार।

हर सुबह नई होगी, हर रात नई होगी,
छोटी मोटी नाराज़गी भूलता जा यार ।
नई उम्मीदें, नए सपने तुम्हें ही सजाने है,
अवसाद, घुटन, तनाव का करो तिरस्कार ।

न दुखाओ दिल ना किसी से खिलवाड़,
दाव पेंच में ज़िंदगी तेरी ही होगी बेज़ार ।
साल बदलता रहेगा, यादें भुलाना दुश्वार,
शुक्राना करता था, रंज बैर से कर इंकार।

गहरे समुद्र में कितने भी तू चला पतवार,
तेरे भीतर अदृश्य शक्ति ही करेगी नैया पार।
डराएगी आँधी, डगमगाएगी हर एक धार,
खुद पर भरोसा खोलेगा, उन्नति के नए द्वार।

डॉ लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे
01.01.2026

           3.   *मेरा परिचय*

मेरा परिचय क्या है
मैं खुद से ही अपरिचित क्यों हूं
दर्पण में जो चेहरा दिखता है
भीतर के सच से छिपित क्यों हूँ ।

मैं खुद को छू सकता हूँ
मैं खुद को महसूस कर सकता हूँ
धड़कनों की भाषा जान सकता हूँ
फिर भी असहज विचलित क्यों हूँ ।

मुझमें इतना सामर्थ्य नहीं
फिर भी हर संकट से लड़ जाता हूँ
सांसों में शक्ति भरपूर है
सपना के प्रति विचलित क्यों हूं ।

डॉ लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे
23.01.2026


   4.   *आओ मुकम्मल करें ख़्वाब*

भूली बिसरी याद सुनो फ़रियाद,
मेरे जज़्बात हैं दिल से अल्फ़ाज़।
वो चाँदनी रात और तुम मेरे साथ,
आधा था चंद्रमा आधी रही बात।
आओ मुकम्मल करें ख़्वाब।

हुए क्या नाराज़ दर्द हुए बेहिसाब,
बीते लम्हें मेरी धरोहर, है सौगात।
सूखी आँखें , तड़पत दिन और रात,
अश्क़ बह निकले बनके जज़्बात
आओ मुकम्मल करें ख़्वाब।

सूनी पड़ी सारी महफ़िलें आज,
कब होगी पहली जैसी मुलाक़ात।
तुम मेरी दुनिया, तुम मेरी परवाज़,
मेरी क़ायनात, ग़ज़ल और आफ़ताब।
आओ मुकम्मल करें ख़्वाब।

तुम बिन कहाँ होश-ओ-हवास,
टूट रही साँसे, लरज़ते कदमात,
बस तुम्हीं से आबाद मेरे जज़्बात,
भीड़ में अकेले में तेरे ही ख़यालात।
आओ मुकम्मल करें ख़्वाब।

— ✍🏻 डॉ. लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे
05.02.2022

       5.  *कुटिल इरादे*

किस बात पे हम रूठे थे
क्यों हो न सकी वो बात।
मुड़कर जो देखता हूं
कोई नहीं बस ख़ामोश साथ।

मीठे ज़हर से जिनके जज़्बात
नज़दीक रहकर लगाये दा़ग।
मुस्कान भी चुभने लगी थीं
मासूमियत मगर लाज़वाब।

कागज़, कलम, दवात, अल्फ़ाज़
वेदना _संवेदना, खुशी_ग़म, जज़्बात।
खट्टी मीठी यादों की मेरी सौगात
अनूठा संग्रह, ये दिल का आग़ाज़।

हर पन्ने पे अपनों का हिसाब
मेरी सांसें करती जिन्हें याद
अब मेरी हमराज़ मेरे ख़्वाब
तजु़र्बों से भरी मेरी किताब

फिर भी मेरी हर दुआ में
निकला बस उनका ही राग।
मासूम चेहरे कुटिल इरादे
बडे़ खौफ़नाक और बेहिसाब़।

डॉ लाल थदानी
#अल्फ़ाज़_दिलसे


02.09.2024